बहरे खफीफ ..............................................आशीर्वाद
२१२२-१२१२-२२....................................गुरु देव पंकज सुबीर जी
मैंने भी दिल लगा लिया यारों।
जख्म पे जख्म पा लिया यारों ॥
मौज फ़िर ज़िन्दगी नही देती ।
जख्म गहरा जो ना लिया यारों ॥
आज ना डगमगा के चल पाया ।
वादा बादे पे था लिया यारों ॥
हादसे और हो गए होते ।
ख़ुद को पत्थर बना लिया यारों ॥
दफ्न कर 'अर्श'लौट जाओ तुम।
रूह तो और जा लिया यारों ॥
प्रकाश'अर्श'
१५/०१/२००९
बादे=शराब ,जा=जगह ।
Thursday, January 15, 2009
Saturday, January 10, 2009
रे मर जाएगा क्यूँ सोचे है ...
गुरु देव पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद से तैयार ये ग़ज़ल ...
कल क्या होगा,क्यूँ सोचे है
मर जाएगा, क्यूँ सोचे है ॥
पछतायेगा , क्यूँ सोचे है ॥
प्रकाश"अर्श"
११/०१/२००९
कल क्या होगा,क्यूँ सोचे है
मर जाएगा, क्यूँ सोचे है ॥
खुद को तक, गिरवी रक्खा है
बिक जाएगा ,क्यूँ सोचे है ॥
बिक जाएगा ,क्यूँ सोचे है ॥
अपना घर कितना अपना है
वो आएगा ,क्यूँ सोचे है ॥शेर नहीं दिल, के छाले हैं
वो समझेगा ,क्यूँ सोचे है ॥
बीत गया जो, रीत गया जो
वो समझेगा ,क्यूँ सोचे है ॥
बीत गया जो, रीत गया जो
फ़िर लौटेगा ,क्यूँ सोचे है ॥
अर्श है बेबस ,इस दुनिया मेंपछतायेगा , क्यूँ सोचे है ॥
प्रकाश"अर्श"
११/०१/२००९
जिस दिन से उसके हाल पे इख्तियार न था...
उसको मेरी मोहब्बत का एतबार न था ।
मैं लौट आऊंगा उसे मिरा इंतज़ार न था॥
वो लौट आई है शहर में मोहब्बत लेकर
बचपन का प्यार शायद यादगार न था ॥
लिखती थी हथेली पे वो इक नाम हमेशा
देखा तो नाम मिरा वो गमगुसार न था ॥
पूछता रहा मैं हाल उसका औरों के हवाले
जिस दिन से उसके हाल पे इख्तियार न था॥
आया है वो भी देख लो चार अश्क बहा के
जिस मजार पे गया था वहां अश्कबार न था॥
आया हूँ कहीं और या हूँ अपने शहर में
पहले तो बागबां"अर्श"यूँ बे-बहार न था ॥
प्रकाश"अर्श"
१०/०१/२००९
मैं लौट आऊंगा उसे मिरा इंतज़ार न था॥
वो लौट आई है शहर में मोहब्बत लेकर
बचपन का प्यार शायद यादगार न था ॥
लिखती थी हथेली पे वो इक नाम हमेशा
देखा तो नाम मिरा वो गमगुसार न था ॥
पूछता रहा मैं हाल उसका औरों के हवाले
जिस दिन से उसके हाल पे इख्तियार न था॥
आया है वो भी देख लो चार अश्क बहा के
जिस मजार पे गया था वहां अश्कबार न था॥
आया हूँ कहीं और या हूँ अपने शहर में
पहले तो बागबां"अर्श"यूँ बे-बहार न था ॥
प्रकाश"अर्श"
१०/०१/२००९
Tuesday, January 6, 2009
आप ही कन्धा आप ही जनाजा ...
पुरानी रंजिश को हवा दीजे ।
फ़िर वही सूरत दिखा दीजे ॥
आज मजबूर-ऐ हालात दिल है
मर ही जाने का हौसला दीजे ॥
हाथ में चार पैसे है बचे अब
ना कहना चाँद-तारे ला दीजे ॥
मैं ग़लत हूँ मुजरिम हूँ अगर
मुझको फंदे पे लटका दीजे ॥
आखिरी ख्वाहिश भी छुपा लूँगा
आप जल्दी से दफना दीजे ॥
आप ही कन्धा आप ही जनाजा
"अर्श"कब्र का रास्ता दिखा दीजे॥
प्रकाश"अर्श"
०६/०१/२००९
आप =मैं ख़ुद ,
फ़िर वही सूरत दिखा दीजे ॥
आज मजबूर-ऐ हालात दिल है
मर ही जाने का हौसला दीजे ॥
हाथ में चार पैसे है बचे अब
ना कहना चाँद-तारे ला दीजे ॥
मैं ग़लत हूँ मुजरिम हूँ अगर
मुझको फंदे पे लटका दीजे ॥
आखिरी ख्वाहिश भी छुपा लूँगा
आप जल्दी से दफना दीजे ॥
आप ही कन्धा आप ही जनाजा
"अर्श"कब्र का रास्ता दिखा दीजे॥
प्रकाश"अर्श"
०६/०१/२००९
आप =मैं ख़ुद ,
Sunday, January 4, 2009
सामने खड़ा है फासला है ये ...
एक बड़ा अच्छा वाकया है ये ।
वो ना समझे है क्या नया है ये ?
हम मोहब्बत में हो गए जुदा ।
लोग कहते इसे कायदा है ये ॥
देख सरगोशी है मोहल्ले में
है मिली उनको जायका है ये ॥
बह रही मुझमे वो लहू बनके
वो मेरी है बस माज़रा है ये ॥
उम्र के जैसी लम्बी हुई दूरी
सामने खड़ा है फासला है ये ॥
लोग कहते है बेवफा है"अर्श"
मैं अगर मानु तो बा-वफ़ा है ये॥
प्रकाश"अर्श"
०४/०१/२००९
वो ना समझे है क्या नया है ये ?
हम मोहब्बत में हो गए जुदा ।
लोग कहते इसे कायदा है ये ॥
देख सरगोशी है मोहल्ले में
है मिली उनको जायका है ये ॥
बह रही मुझमे वो लहू बनके
वो मेरी है बस माज़रा है ये ॥
उम्र के जैसी लम्बी हुई दूरी
सामने खड़ा है फासला है ये ॥
लोग कहते है बेवफा है"अर्श"
मैं अगर मानु तो बा-वफ़ा है ये॥
प्रकाश"अर्श"
०४/०१/२००९
Friday, January 2, 2009
ये खुश्बू जरा जानी पहचानी लगी ...
ढूँढने उनको हम जब भी निकले ।
लो दूर तक बस रास्ते ही निकले ॥
फासला बस कदम भर का ही था,
बढ़ा तो गाम फ़िर गाम ही निकले ॥
दर्द में जब आँख से आंसू ना बहे ,
पिछली दफा थे आखिरी निकले ॥
हया ने पूछा जब देखो शरमा के
हया का नाम तो हया ही निकले ॥
उम्र भर मुझको मंजिल ना मिली
मुश्किलों में चलाना यूँ ही निकले ॥
ये खुशबु जरा जानी पहचानी लगी
लगता है "अर्श"इधर से ही निकले ॥
प्रकाश"अर्श"
०२/०१/२००९
लो दूर तक बस रास्ते ही निकले ॥
फासला बस कदम भर का ही था,
बढ़ा तो गाम फ़िर गाम ही निकले ॥
दर्द में जब आँख से आंसू ना बहे ,
पिछली दफा थे आखिरी निकले ॥
हया ने पूछा जब देखो शरमा के
हया का नाम तो हया ही निकले ॥
उम्र भर मुझको मंजिल ना मिली
मुश्किलों में चलाना यूँ ही निकले ॥
ये खुशबु जरा जानी पहचानी लगी
लगता है "अर्श"इधर से ही निकले ॥
प्रकाश"अर्श"
०२/०१/२००९
Thursday, January 1, 2009
है मुनासिब के याद-दाश्त मेरी ग़लत हो ...
वो कौन है जो मेरी तरह दिखता है ।
है मेरा अक्स या मेरी तरह दिखता है ॥
देखकर उड़ते परिंदों को दिल मेरा रोए
उड़ान तू भी तरसे तो मेरी तरह दिखता है ॥
लहू को उसके रगों का मुआयना कर लो
लहू सा है तो फ़िर मेरी तरह दिखता है ॥
मैं हूँ जो बस गैरते-साजिश में मारा गया
तू ठुकराया हुआ है तो मेरी तरह दिखता है ॥
है मुनासिब के याद-दाश्त मेरी ग़लत हो
वादा उसने किया था जो मेरी तरह दिखता है ॥
होता एहसास अगर"अर्श"अपने जुल्मों का
ना करता चर्चे अगर मेरी तरह दिखता है ॥
प्रकाश"अर्श"
०१/०१/२००९
है मेरा अक्स या मेरी तरह दिखता है ॥
देखकर उड़ते परिंदों को दिल मेरा रोए
उड़ान तू भी तरसे तो मेरी तरह दिखता है ॥
लहू को उसके रगों का मुआयना कर लो
लहू सा है तो फ़िर मेरी तरह दिखता है ॥
मैं हूँ जो बस गैरते-साजिश में मारा गया
तू ठुकराया हुआ है तो मेरी तरह दिखता है ॥
है मुनासिब के याद-दाश्त मेरी ग़लत हो
वादा उसने किया था जो मेरी तरह दिखता है ॥
होता एहसास अगर"अर्श"अपने जुल्मों का
ना करता चर्चे अगर मेरी तरह दिखता है ॥
प्रकाश"अर्श"
०१/०१/२००९
Tuesday, December 30, 2008
दरिया है वो प्यासा है वो देखो नकाब में ...
चेहरा छुपाए रख्खा है वो देखो नकाब में ।
कातील है फ़रिश्ता है वो देखो नकाब में ॥
कत्ल करता है ऐसे के पता भी ना चले ,
जख्म देता है गहरा है वो देखो नकाब में ॥
हमसे रूठा है ये सितम है या अदा उसकी
जैसा भी है अच्छा है वो देखो नकाब में ॥
नाजुक लबों से उसके मोहब्बत की सदा सुन
जिन्दा हूँ के आया है वो देखो नकाब में ॥
मैं हूँ इस बात पे खामोश तू उसकी सब्र देख
दरिया है वो प्यासा है वो देखो नकाब में ॥
एक बेकली है जो दफ़न है"अर्श"मेरे सीने में
एक खलिश है के तड़पता है वो देखो नकाब में ॥
प्रकाश "अर्श"
३०/१२/२००८
कातील है फ़रिश्ता है वो देखो नकाब में ॥
कत्ल करता है ऐसे के पता भी ना चले ,
जख्म देता है गहरा है वो देखो नकाब में ॥
हमसे रूठा है ये सितम है या अदा उसकी
जैसा भी है अच्छा है वो देखो नकाब में ॥
नाजुक लबों से उसके मोहब्बत की सदा सुन
जिन्दा हूँ के आया है वो देखो नकाब में ॥
मैं हूँ इस बात पे खामोश तू उसकी सब्र देख
दरिया है वो प्यासा है वो देखो नकाब में ॥
एक बेकली है जो दफ़न है"अर्श"मेरे सीने में
एक खलिश है के तड़पता है वो देखो नकाब में ॥
प्रकाश "अर्श"
३०/१२/२००८
Saturday, December 27, 2008
अगर जुन्नार और तस्बीह दोनों एक हो जाए...
कोई लकीर नही खींचते दिलों के रास्ते में ।
के हमारा घर नही बांटता मीलों के रास्ते में ॥
दोनों सरहद में बंटें है मगर यूँ गुमराह न हों
के अनपढ़ आ नही सकता काबीलों के रास्ते में ॥
मौज आएगी टकराएगी मगर ये डर कैसा
के मौज दम भी तोडे है साहिलों के रास्ते में ॥
दोनों ने तान रखा है निशाना एक दूजे पे
कोई फ़िर आ नही सकता जाहिलों के रास्ते में ॥
रगों में खून भी बहता है उसके मेरे पूर्वज का
हमारी पहचान रहे कायम तब्दीलों के रास्ते में ॥
अगर जुन्नार और तस्बीह दोनों एक हो जायें
कोई फ़िर आ नही सकता फाजिलों के रास्ते में॥
प्रकाश"अर्श"
जुन्नार=जनेऊ ,तस्बीह=मुसलमानों का जाप माला
फाजिलों= प्रवीन,श्रेष्ठ ।
के हमारा घर नही बांटता मीलों के रास्ते में ॥
दोनों सरहद में बंटें है मगर यूँ गुमराह न हों
के अनपढ़ आ नही सकता काबीलों के रास्ते में ॥
मौज आएगी टकराएगी मगर ये डर कैसा
के मौज दम भी तोडे है साहिलों के रास्ते में ॥
दोनों ने तान रखा है निशाना एक दूजे पे
कोई फ़िर आ नही सकता जाहिलों के रास्ते में ॥
रगों में खून भी बहता है उसके मेरे पूर्वज का
हमारी पहचान रहे कायम तब्दीलों के रास्ते में ॥
अगर जुन्नार और तस्बीह दोनों एक हो जायें
कोई फ़िर आ नही सकता फाजिलों के रास्ते में॥
प्रकाश"अर्श"
जुन्नार=जनेऊ ,तस्बीह=मुसलमानों का जाप माला
फाजिलों= प्रवीन,श्रेष्ठ ।
Friday, December 26, 2008
मेरे हर ख्वाब को मकसद बनाये बैठी है ...
आज मैं इस ब्लॉग पे अपनी पचासवीं ग़ज़ल पोस्ट कर रहा हूँ आप सभी का स्नेह और आशीर्वाद चाहूँगा ........
उसके भी सितम ढाने की अदा खूब है ।
दूर जा जा के पास आने की अदा खूब है ॥
बैठी है महफ़िल में मगर देखो तो सही
दूर ही से नज़रें मिलाने की अदा खूब है
मेरे हर ख्वाब को मकसद बनाये बैठी है
मोहब्बत उसके निभाने की अदा खूब है ॥
रंज में रोती है बेशक रुलाती भी है मुझको
इश्क में रूठने मनाने की अदा खूब है ॥
कभी इतेफाक से मिल जाए तो शरमाके
दांतों में उंगली दबाने की अदा खूब है ॥
निगारे-नजरवान कहूँ या"अर्श"हयाते-जान
शब्-ऐ-तारिक उसके मिटाने की अदा खूब है ॥
प्रकाश "अर्श"
२६/१२/२००८
निगारे-नजरवान=आंखों में खुबसूरत दिखने वाली
शब्-ऐ-तारिक=अँधेरी रात (इसका प्रयोग ज़िन्दगी
में फैले अंधियारे से है )
हयाते-जान=ज़िन्दगी की जान।
Wednesday, December 24, 2008
मैं भटकता रहा इत्मिनान से गैरों की बस्ती में ...
वो के एक रस्म निभाने पे खफा हो बैठा ।
जख्म उसी के थे दिखाने पे खफा हो बैठा ॥
तिश्नगी उसकी किस क़द्र होगी महफ़िल में
जाम टकरा के पिलाने पे खफा हो बैठा ॥
जख्म देकर हादसा बताये फिरता है मगर
वो हादसा अमलन गिनाने पे खफा हो बैठा ॥
रस्मे उल्फत जो सिखाता रहा उम्र भर मुझको
आख़िर वही रस्म निभाने पे खफा हो बैठा ॥
वो दुआ करता रहा मिल जाए खियाबां उसको
लो खिजां में फूल खिलाने पे खफा हो बैठा ॥
मैं भटकता रहा इत्मिनान से गैरो की बस्ती में
दिया जो उसको आशियाने पे खफा हो बैठा ॥
एक चेहरेमें छुपाये रखा है"अर्श"कई चेहरे
आईना उसको दिखाने पे खफा हो बैठा ॥
प्रकाश"अर्श"
२५/१२/२००८
जख्म उसी के थे दिखाने पे खफा हो बैठा ॥
तिश्नगी उसकी किस क़द्र होगी महफ़िल में
जाम टकरा के पिलाने पे खफा हो बैठा ॥
जख्म देकर हादसा बताये फिरता है मगर
वो हादसा अमलन गिनाने पे खफा हो बैठा ॥
रस्मे उल्फत जो सिखाता रहा उम्र भर मुझको
आख़िर वही रस्म निभाने पे खफा हो बैठा ॥
वो दुआ करता रहा मिल जाए खियाबां उसको
लो खिजां में फूल खिलाने पे खफा हो बैठा ॥
मैं भटकता रहा इत्मिनान से गैरो की बस्ती में
दिया जो उसको आशियाने पे खफा हो बैठा ॥
एक चेहरेमें छुपाये रखा है"अर्श"कई चेहरे
आईना उसको दिखाने पे खफा हो बैठा ॥
प्रकाश"अर्श"
२५/१२/२००८
Tuesday, December 23, 2008
घर तक आए है तमाशाइयां ...
मैं हूँ तू है, और है तन्हाईयां ।
दिल है धड़कन और अंगडाइयां ॥
मौसम भी है,कुछ दिल बेबस
दिल कहता है कर बेईमानीयाँ ॥
देखो तमाशा ना बन जाए कहीं
घर तक आए है तमाशाइयां ॥
तेरी आँखें तो है दोनों जहाँ
इस दो जहाँ पे है कुरबानीयाँ ॥
जुल्फ तेरे है यूँ घटावों जैसी
हुस्न से है तेरे रोशानाइयां ॥
तेरी नजाकत तेरी हया भी
कर देगा"अर्श"फ़िर रुस्वाइयां ॥
प्रकाश "अर्श"
२३/१२/२००८
दिल है धड़कन और अंगडाइयां ॥
मौसम भी है,कुछ दिल बेबस
दिल कहता है कर बेईमानीयाँ ॥
देखो तमाशा ना बन जाए कहीं
घर तक आए है तमाशाइयां ॥
तेरी आँखें तो है दोनों जहाँ
इस दो जहाँ पे है कुरबानीयाँ ॥
जुल्फ तेरे है यूँ घटावों जैसी
हुस्न से है तेरे रोशानाइयां ॥
तेरी नजाकत तेरी हया भी
कर देगा"अर्श"फ़िर रुस्वाइयां ॥
प्रकाश "अर्श"
२३/१२/२००८
Tuesday, December 16, 2008
वो खड़ा है मुखालिफ-सफ में ....
वो रात कभी का भुला दिया ।
जो ख्वाब जगे थे सुला दिया ॥
वो खड़ा है मुखालिफ-सफ में
इस बेदिली ने फ़िर रुला दिया ॥
जो करता रहा जुर्मो का सौदा
मुन्सफी में उसको बुला दिया ॥
रहने लगा मिजाज से आज-कल
जिस वक्त से हमको भुला दिया ॥
क्या बात थी तुम मुकर गए
किस बात पे यूँ लहू ला दिया ॥
आवो ना आजावो"अर्श"वरना
ज़िन्दगी ने दाम पे झुला दिया ॥
प्रकाश"अर्श"
१६/१२/२००८
मुखालिफ-सफ=बिरोधियों की पंक्ति
दाम=फंदा ,मुन्सफी=फैसला॥
एक शे'र खास तौर से विनय भाई(नज़र) के लिए...
लिखो सानी अब तुम नज़र
मैंने तो मिसरा उला दिया ॥
जो ख्वाब जगे थे सुला दिया ॥
वो खड़ा है मुखालिफ-सफ में
इस बेदिली ने फ़िर रुला दिया ॥
जो करता रहा जुर्मो का सौदा
मुन्सफी में उसको बुला दिया ॥
रहने लगा मिजाज से आज-कल
जिस वक्त से हमको भुला दिया ॥
क्या बात थी तुम मुकर गए
किस बात पे यूँ लहू ला दिया ॥
आवो ना आजावो"अर्श"वरना
ज़िन्दगी ने दाम पे झुला दिया ॥
प्रकाश"अर्श"
१६/१२/२००८
मुखालिफ-सफ=बिरोधियों की पंक्ति
दाम=फंदा ,मुन्सफी=फैसला॥
एक शे'र खास तौर से विनय भाई(नज़र) के लिए...
लिखो सानी अब तुम नज़र
मैंने तो मिसरा उला दिया ॥
Sunday, December 14, 2008
काटों की तिजारत सा मेहमां निकला ...
मैं भी, किस दर्जे, दीवाना निकला ।
जो था मेहरबां,नामेहरबां निकला ॥
देता रहा मुझे,जो तस्सलियाँ उम्रभर
वो कहता रहा हा -हा ,ना-ना निकला ॥
जाने लगा तो ,दो -चार जख्म दे गया
देख वो नामेहरबां,मेहरबां निकला ॥
फ़िर किसी रोज,वो तड़पकर आया
मिली तस्कीन,मगर अब्ना निकला ॥
मिले थे जिस उम्मीद से"अर्श"भरम में
काटों की तिजारत,सा मेहमां निकला ॥
प्रकाश "अर्श"
१४/१२/२००८
तिजारत=खरीद-बिक्री ,अब्ना =अवसर
तस्कीन = शान्ति ॥
जो था मेहरबां,नामेहरबां निकला ॥
देता रहा मुझे,जो तस्सलियाँ उम्रभर
वो कहता रहा हा -हा ,ना-ना निकला ॥
जाने लगा तो ,दो -चार जख्म दे गया
देख वो नामेहरबां,मेहरबां निकला ॥
फ़िर किसी रोज,वो तड़पकर आया
मिली तस्कीन,मगर अब्ना निकला ॥
मिले थे जिस उम्मीद से"अर्श"भरम में
काटों की तिजारत,सा मेहमां निकला ॥
प्रकाश "अर्श"
१४/१२/२००८
तिजारत=खरीद-बिक्री ,अब्ना =अवसर
तस्कीन = शान्ति ॥
Saturday, December 13, 2008
दिखे है मुझे अब विरानियाँ शहर में ...
बन जाए अगर आदमी आदमी सा ।
के फितरत नहीं आदमी आदमी सा ॥
ना आंसू बहेंगे आंखों से किसी के
गर काटे कोई आदमी आदमी सा ॥
दीवाना हुआ है वो पागल भी मानों
दिखा है कोई आदमी आदमी सा ॥
कहे क्या कोई अब फ़साना ग़मों का
हँसेंगे सभी कह आदमी आदमी सा ॥
हंसीं खेल में तबाह ना कर किसी को
दिल तेरा भी है आदमी आदमी सा ॥
दिखे है मुझे अब विरानियाँ शहर में
क्या है गाँव में आदमी आदमी सा ॥
मुल्कों में ना होगी यूँ सरहद की बातें
बन जाए अगर आदमी आदमी सा ॥
वो कौन है जो कोने में सिसक रहा है
पूछो हाल"अर्श" आदमी आदमी सा ॥
प्रकाश"अर्श"
१३/१२/२००८
के फितरत नहीं आदमी आदमी सा ॥
ना आंसू बहेंगे आंखों से किसी के
गर काटे कोई आदमी आदमी सा ॥
दीवाना हुआ है वो पागल भी मानों
दिखा है कोई आदमी आदमी सा ॥
कहे क्या कोई अब फ़साना ग़मों का
हँसेंगे सभी कह आदमी आदमी सा ॥
हंसीं खेल में तबाह ना कर किसी को
दिल तेरा भी है आदमी आदमी सा ॥
दिखे है मुझे अब विरानियाँ शहर में
क्या है गाँव में आदमी आदमी सा ॥
मुल्कों में ना होगी यूँ सरहद की बातें
बन जाए अगर आदमी आदमी सा ॥
वो कौन है जो कोने में सिसक रहा है
पूछो हाल"अर्श" आदमी आदमी सा ॥
प्रकाश"अर्श"
१३/१२/२००८
Thursday, December 11, 2008
बैठा हूँ दर्द की बस्ती में तजुर्बों के लिए ...
शबे-फिराक में वो कैसी निशां छोड़ गया ।
जहाँ से वो गया मुझको वहां छोड़ गया ॥
रहेगा दिल में अखारस ये उम्र भर के लिए
जिस बेबसी से वो यूँ आस्तां छोड़ गया ॥
चली जो दर्द की आंधी गर्दो-गुबार लेकर
बुझी-बुझी से राख में वो धुंआ छोड़ गया ॥
मुझे रोता, तड़पता. छटपटाता देखकर
किया एहसान मुझे मेरे मकां छोड़ गया ॥
बैठा हूँ दर्द की बस्ती में तजुर्बों के लिए
कहाँ है वैसा मौसम जो समां छोड़ गया ॥
वो मिला जीने का मकसद मिला था मुझे
वो गया"अर्श"फ़िर अहले-जुबां छोड़ गया ॥
प्रकाश "अर्श"
११/१२/२००८
जहाँ से वो गया मुझको वहां छोड़ गया ॥
रहेगा दिल में अखारस ये उम्र भर के लिए
जिस बेबसी से वो यूँ आस्तां छोड़ गया ॥
चली जो दर्द की आंधी गर्दो-गुबार लेकर
बुझी-बुझी से राख में वो धुंआ छोड़ गया ॥
मुझे रोता, तड़पता. छटपटाता देखकर
किया एहसान मुझे मेरे मकां छोड़ गया ॥
बैठा हूँ दर्द की बस्ती में तजुर्बों के लिए
कहाँ है वैसा मौसम जो समां छोड़ गया ॥
वो मिला जीने का मकसद मिला था मुझे
वो गया"अर्श"फ़िर अहले-जुबां छोड़ गया ॥
प्रकाश "अर्श"
११/१२/२००८
Monday, December 8, 2008
अब रौशनी कहाँ है मेरे हिस्से ...
अब रौशनी कहाँ है मेरे हिस्से ।
लव भी ज़दा ज़दा है मेरे हिस्से ॥
गर संभल सका ,तो चल लूँगा ।
पर रास्ता ,कहाँ है मेरे हिस्से ॥
मैं भी चीखता चिल्लाता मगर ।
कई दर्द बेजुबां है मेरे हिस्से ॥
हुजूम हो खुशी का तेरी महफ़िल में ।
ज़ख्म है, बद्दुआ है मेरे हिस्से ॥
चाँद तारे जो तेरी निगहबानी करे ।
काफिला जुगनुओं का है मेरे हिस्से ॥
नही है"अर्श"मेरे नसीब ना सही ।
तेरी निगाह का, चारा है मेरे हिस्से ॥
प्रकाश "अर्श"
०९/१२/२००८
ज़दा =चोट खाया ,निगहबानी=रक्षक ,
लव भी ज़दा ज़दा है मेरे हिस्से ॥
गर संभल सका ,तो चल लूँगा ।
पर रास्ता ,कहाँ है मेरे हिस्से ॥
मैं भी चीखता चिल्लाता मगर ।
कई दर्द बेजुबां है मेरे हिस्से ॥
हुजूम हो खुशी का तेरी महफ़िल में ।
ज़ख्म है, बद्दुआ है मेरे हिस्से ॥
चाँद तारे जो तेरी निगहबानी करे ।
काफिला जुगनुओं का है मेरे हिस्से ॥
नही है"अर्श"मेरे नसीब ना सही ।
तेरी निगाह का, चारा है मेरे हिस्से ॥
प्रकाश "अर्श"
०९/१२/२००८
ज़दा =चोट खाया ,निगहबानी=रक्षक ,
Saturday, December 6, 2008
कुछ कम ही मिले मुझसे ज़िन्दगी के बसर में ...
कुछ कम ही मिले मुझसे ज़िन्दगी के बसर में।
आया नहीं वो, के न था , दुआ के असर में ॥
माना के मुद्दई हूँ मैं,पर इतनी तो ख़बर हो ।
क्या ज़ुल्म थी हमारी,कहो जिक्र जबर में ॥
उकता गया हूँ अब तो , मैं भी यूँ ही लेटे हुए ।
चलती रही थी नब्ज़ मेरी,डाला जो कबर में ॥
मिलाया खाक में मुझको,मिटाई हस्ती भी मेरी ।
धुन्दोगे मेरे बाद मुझको,वहीँ गर्दे सफर में ॥
वही मैं था, वही मय वही साकी थे बने तुम ।
वहीँ डूब के रह गया था मैं,बस तेरी नज़र में ॥
आयेंगे मिलजायेगे तुझे,"अर्श"नए दोस्त ।
मुश्किल ही मिले जैसा मेरे,कोई राहबर में ॥
प्रकाश"अर्श"
०७/१२/२००८
आया नहीं वो, के न था , दुआ के असर में ॥
माना के मुद्दई हूँ मैं,पर इतनी तो ख़बर हो ।
क्या ज़ुल्म थी हमारी,कहो जिक्र जबर में ॥
उकता गया हूँ अब तो , मैं भी यूँ ही लेटे हुए ।
चलती रही थी नब्ज़ मेरी,डाला जो कबर में ॥
मिलाया खाक में मुझको,मिटाई हस्ती भी मेरी ।
धुन्दोगे मेरे बाद मुझको,वहीँ गर्दे सफर में ॥
वही मैं था, वही मय वही साकी थे बने तुम ।
वहीँ डूब के रह गया था मैं,बस तेरी नज़र में ॥
आयेंगे मिलजायेगे तुझे,"अर्श"नए दोस्त ।
मुश्किल ही मिले जैसा मेरे,कोई राहबर में ॥
प्रकाश"अर्श"
०७/१२/२००८
Tuesday, December 2, 2008
क्या हुस्न है क्या जमाल है ...
क्या हुस्न है, क्या जमाल है ।
खुदाया तिरा, क्या कमाल है ॥
वो सितमगर है,मगर फ़िर भी ।
पूछता वही तो ,मेरा हाल है ॥
वक्त ने तो मुझे,ठुकरा दिया था ।
उसने थामा तो,हुआ बवाल है ॥
अपना सबकुछ,गवां कर मैंने ।
वो मिला फ़िर ,क्या मलाल है ॥
इक सदा है ,मुझसे जुड़ी हुई ।
वो सदा भी,उसका सवाल है ॥
है चाँदनी में,धूलि हुई या"अर्श"
मेरी नज़र ,का इकबाल है ॥
प्रकाश "अर्श"
०२/१२/२००८
इकबाल = सौभाग्य ,
खुदाया तिरा, क्या कमाल है ॥
वो सितमगर है,मगर फ़िर भी ।
पूछता वही तो ,मेरा हाल है ॥
वक्त ने तो मुझे,ठुकरा दिया था ।
उसने थामा तो,हुआ बवाल है ॥
अपना सबकुछ,गवां कर मैंने ।
वो मिला फ़िर ,क्या मलाल है ॥
इक सदा है ,मुझसे जुड़ी हुई ।
वो सदा भी,उसका सवाल है ॥
है चाँदनी में,धूलि हुई या"अर्श"
मेरी नज़र ,का इकबाल है ॥
प्रकाश "अर्श"
०२/१२/२००८
इकबाल = सौभाग्य ,
Sunday, November 30, 2008
किस्मत में मेरे चैन से जीना लिखा दे ...
वेसे तो मैं मुसलसल ग़ज़ल ही लिखने की कोशिश करता हूँ ,मगर एक गैर मुसलसल ग़ज़ल आप सबों के सामने पेश कर रहा हूँ उम्मीद करता हूँ पसंद आए........
किस्मत में मेरे , चैन से जीना लिख दे ।
दोजख भी कुबूल हो,मक्का-मदीना लिख दे ॥
जहाँ दहशत जदा हैं लोग,चलने से गोलियां ।
हर गोलिओं के नाम , मेरा सीना लिख दे ॥
मेहनत किए बगैर ,बद अंजाम से डरता हूँ ।
कुछ काम कर सकूँ,वो खून-पसीना लिख दे ॥
वो शान है उनकी ताज पे,गोरों के महफ़िल में ।
कभी शर्म आ जाए ,तो वो नगीना लिख दे ॥
जितना वो पिसेगी ,चढेगा उतना उसका रंग ।
मोहब्बत का नाम ,कोई संगे - हिना लिख दे ॥
दिखे है तेरा अक्स ,हर टुकड़े में यहाँ "अर्श"
टुटा था ,वो दिल था ,तू आइना लिख दे ॥
प्रकाश "अर्श"
३०/११/२००८
चौथा शे'र भारत के कोहिनूर हीरे के बारे में कहा गया है जो इंग्लॅण्ड के महारानी के ताज पे सुशोभित है ॥
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