Wednesday, September 17, 2008

ये कैसा कसाई था वो ...................

हाँ,वो ब्लू कमीज और काले रंग का पैंट पहन रखा था। यही पूछा था मेरे से ठाणे से किसी सिपाही ने अपने कांफिर्मेशन के लिए ॥ मेरे हाँ के जवाब में उसने मुझे ठाणे बुलाया कहा आपके दोस्त का दुर्घटना हो गया है। उसकी अकाल मृत्यु की ख़बर पते ही जैसे मेरे पैरों टेल ज़मीं निकल गई ॥ अपनी मोटर साइकिल चलाते वाक्क्त मेरा भी हाँथ कांप रहे थे ,किसी तरह से जब वहां पहुँचा तो सारी बातें साप्ह हो गई । ठाणे के सभी लोग काफी सहयोगी जैसे वर्ताव कर रहे थे सबसे ज्यादा साहिबाबाद ठाणे के सब-इंसपेक्टर तिलक चाँद जी जो शायद हमारे परेशानियों से अवगत थे काफी सहयोग दिया उन्होंने । ये वही शख्स था जिससे दोस्ती मेरी पहली दफा मैनेजमेंट कॉलेज में दाखिला के वक्ता हुआ था वो भी डेल्ही जैसे शहर में पहली दफा आया था बात चलते कहते वो मेरे अपने शहर के तरफ़ का ही निकला बहोत सारे सपने थे दोनों के आँखों में मगर अपनी अपनी जगह पे थे ॥ उसे अपनी बड़ी बहन की शादी के लिए लड़के धुन्धने थे वो बहोत बारी मेरे से इस बारे में चर्चा करा करता था । उसका एक छोटा भाई था जो एरोनोतिला इंगिनिओर था यही था मगर दोनों साथ नही रहते थे । उसका छोटा भाई जब भाई हमारे पास आकर अपने रूम पे जाता पैर छू के वो प्रणाम करता था। हम दोनों में काफी बरी झगरे भी होते थे मगर वो भी गुस्सा सारे पानी के बुलबुले की तरह होती थी । अक्सर हम भविष्य की रुपरेखा तैयार करते थे । हमने एक कंपनी भी सोंची थी खोलने की मगर वो खवाब अधुरा रह गया॥ अभी उसके देहांत के लगभग मुश्किल से १६ दिन ही हुए थे मेरी आँखे और मेरे कान भरोषा नही कर प् रहे थे जो मैंने सुना था॥ वो अक्सर मेरे ग़ज़लों को सुनता था और सराहा करता था ,हाँ मगर वो सबसे बड़ा मेरा आलोचक भी था ,मुझे अच्छा भी लगता था ॥ उसकी अन्तिम बिदाई में भी मुझे इतना दुःख नही हुआ जब मैंने मानवता कान ऐसा गन्दा खेल देखा शायद उस वक्त वो उसे पानी के लिए नही पूछा रहा होगा जब वो कराह रहा होगा उसे तो उसके बटुए की पड़ी थी जिसमे उसके कार्ड्स थे । हमने सोंचा लोग कितने अच्छे है मगर मेरा दुःख उस समय और ज्यादा बढ़ गया जब उसके मृत्यु कोई १६ दिन बाद ही उसके क्रेडिट कार्ड कां बील आया । वो भी स्वपे उसके मृत्यु के दो दिन के बाद किया गया था । मेरी ऊपर वाले से यही प्रार्थना है के मेरे दोस्त के आत्मा को शान्ति दो और उस शख्स को इतनी बरकत दो जिसे ये जरुरत पड़ती है के वो किसी का मरने का वेट करे और उसका बतुया उठाये और अपना जीविका चलाये॥ मैंने कसैओं के बारे में तो सुना था मगर ये कौन था ...


हमेशा उसके स्मृति में

प्रकाश "अर्श"

१७/०९/2008

Saturday, August 30, 2008

हज़ार बातें कही थी तुमने.......

हज़ार बातें कही थी तुमने
हज़ार खावोहिश दबी है दिल में
वही मोहब्बत , वही आरजू है
जो खवाब आंखों में दिखाई थी तुमने॥

हमारे दिल का ,वो एक कोना
कोई काट कर ले जा रहा है
वही जिन्दा बचा था
अबतक
जिसको ज़िन्दगी दिखाई थी तुमने ॥

मोहब्बत सज़ा है
मैं मान लेता
मगर साँस कायम है
अबतक उसी से
हज़ार बातें कही थी तुमने
हज़ार खावोहिश दबी है दिल में
वही मोहब्बत, वही आरजू है
जो खवाब आंखों में दिखाई थी तुमने ॥

प्रकाश "अर्श"
३०/०८/२००८

Saturday, August 23, 2008

तुम जो कर रहे थे अभी ......



तुम जो कर रहे थे अभी ,क्या वो काम बाकी है ।
हो गया बदनाम बहोत ,बस थोडी नाम बाकी है ॥

फुर्सत मिले तो फ़िर से इस तरफ़ चले आना ,
गर्दिश में हूँ,तलब है,आखिरी अंजाम बाकी है ॥

जो भी था पास मेरे वो बाँट दी ज़माने में ,
तुम भी आवो,ले जावो ,तुम्हारा इनाम बाकी है ॥

वो कौन था जिसने खोदी थी कब्र की मिट्टियाँ ,
उससे कहो ठहरे अभी ,बस थोडी काम बाकी है ॥

खुदा भी सोंच के गुम है ,ये किसका ज़नाजा है ,
जहाँ हसीनाएं शामिल है ,क्या वहां इंतकाम बाकी है ॥

मैं पी के लड़खाधाया भी नही और तुमने "अर्श"
कहदिया रिंद कोई और है ,ये उसका जाम बाकी है ॥

प्रकाश "अर्श"
२३/०८/२००८

Monday, August 18, 2008

कैसे कहूँ के फकत वाक्य हो तुम.....

कैसे कहूँ के फकत वाक़या हो तुम ।
मुझसे कोई पूछे भला क्या-क्या हो तुम॥

जो हो सका ना , मिल सका मुझको ,
वही सज़दा मेरी वही खुदा हो तुम ॥

नही है रोशनी मेरी मुक्कदर में ना सही ,
मैं जानता हूँ एक जलती हुई चरागा हो तुम ॥

शुर्ख होंठो पे तब्बसुम की बिजलियाँ ,
ये भरम है,चाँद तारों का हिस्सा हो तुम ॥

अजीब शख्स है ,फकत हँसता रहता है ,
गर खफा हो तो कह दो के खफा हो तुम ॥

"अर्श" पि के होश में आया न उम्र भर ,
वही मय हो वही मयकदा हो तुम ॥


प्रकाश "अर्श"
१७/०८/२००८